आरपार >> एक जबर सत् घुमाव

आरपार आदेश

एक जबरदस्त घुमाव

साधक नित्य-नूतन जीता हे, ये यात्रा अखंड हे।

साधक स्वयं एक अनुभव-शृंखला से गुजरता हे, हर अनुभव कुछ सीखता हे। जो जाना, बन जाता हे। ये सत्संग-चर्या, साधक स्वयं की जरूरत, मोहब्बत हे। हसते-गाते वक्त अच्छा गुजरता हे। सब अघोर आनंद भजन साधन हे।

ये साधन-चर्या स्वयं अनुस्मारक हे। ये \’सत्संग-साधन-शृंखला\’, पूज्य सत्गुरु प्रसाद हे।

तथा साधु-संत-परम-परा-वाणी, सत्-गुरु सत्-वचन की गूंज हे। जो हृदय से आरपार होके, अस्तित्व से टकराती हे। सब मोह मिटाती हे, खुद को-खुद से मिलाती हे। अब अस्तित्व का अलग से कोई नामो निशान नही। सब आरपार

साधक जब सत्-गुरु अनुग्रह अपार-कृपा-प्रसाद पाता हे, गुरु-मंडल गुरु-तत्व जुड जाता हे, सब धन्य-धन्य हो जाता हे। स्वयं में एक अपूर्व अमुलाग्र बदलाव आता हे। सब धन्य-धन्य हो जाता हे।

जीवन मे एक ज़बरदस्त घुमाव आता हे। सब धन्य-धन्य हो जाता हे।

॥ स्वान्तः सुखाय। ओम नमः शिवाय ॥

ओम अघोर आनंद

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