रे ऽ !

परमार्थ मे मन नही लगता,

मन संसार-स्वार्थ मे रमता,

जप-जाप उपासन, ताप सा भाता,

मर्कट मन, ध्यान नही टिकता,

अब क्या करे साधक?

*

रे ऽ प्यारे !

मन लगने से – जप नहीं होता,

जप जपनेसे से – मन लगता हे,

स्वरूप साधना में।

*

साधना करना नही

जीवन मे साधन नही,

साधनमय जीवन जीना,

ये जीवन हे साधना

सदा सर्वदा

*

ध्यान करना नही

ध्यान लगाना नही

जीवन ध्यान-मय जीना

बस ! ध्यान देना

सदा सर्वदा

*

गुरु वचन – सत वचन

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